Darbhanga Fort History in Hindi: दिल्ली के लाल क़िले के बारे में तो आपको बख़ूबी पता है, क्या दूसरे लाल किले के बारे में आपको कोई जानकारी है?

71
Darbhanga Fort History in Hindi

Darbhanga Fort History in Hindi

दिल्ली के लाल क़िले के बारे में तो आपको बख़ूबी पता है, क्या दूसरे लाल किले के बारे में आपको कोई जानकारी है?
तो चलिये , चलते हैं दूसरे लाल क़िले की सैर पर।

ये लाल किला बिहार में है और मिथिलांचल की राजधानी कहे जाने वाले शहर दरभंगा में है। ये लाल क़िला दरभंगा राजघराने के वंशजों ने बनवाया था।

हम आपको इस क़िले के बारे में सम्पूर्ण जानकारी दे रहे हैं।
दरभंगा राजघराने का इतिहास देखें तो ये ईस्वी 1556 से शुरू हुआ और 1947 में स्वाधीनता के पश्चात इस राजघराने के शासन का अंत हुआ।
इस राजघराने की स्थापना का श्रेय मैथिल ब्राह्मणों को जाता है और अंग्रेज़ों के समय बंगाल प्रान्त ( तात्कालीन ) के कुल 18 सर्किलों के 4,495 गांवों पर इस राजघराने का शासन चलता था।

दरभंगा राजघराना मूलतः एक ज़मींदारी व्यवस्था थी जिसे जन सामान्य की भाषा में राजघराना या दरबार भी कहा जाता था। इस राज घराने की शुरआत का श्रेय राजा महेश ठाकुर को जाता है , जिन्होंने 15556 में इस ज़मींदारी व्यवस्था की शुरुआत की। बाद में इनके वंशज राजा राघव सिंह ने ‘ सिंह ‘ की उपाधि धारण की जो आज तक इनके वंशज धारण करते आ रहे हैं।

इसके अतिरिक्त यहां दो महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख आवश्यक हो जाता है।

  • पहला तो ये कि बिहार और उड़ीसा तब बंगाल प्रान्त के ही हिस्सा थे, स्वतंत्र राज्य के रूप में इनका कोई अस्तित्व नहीं था। 22 मार्च 1912 को बिहार राज्य का गठन हुआ और 1936 में बिहार से कट कर उड़ीसा नामक राज्य बना।
  • दूसरा तथ्य है कि दरभंगा तब बंगाल में प्रवेश करने का द्वार माना जाता था, क्योंकि बंगाल के शहरों में जाने के लिए यहां संसाधन ज़्यादा थे; इसलिए इस शहर का नाम ‘ द्वारबंगा ‘ पड़ा जो बाद में अपभ्रंश होकर दरभंगा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

Darbhanga Fort History:-

अब बात करें दरभंगा के प्रसिद्ध लाल किले की।

दरभंगा के इस प्रसिद्ध लाल क़िले को रामबाग़ का क़िला भी कहा जाता है, क्योंकि ये क़िला रामबाग़ नामक महल को चारों तरफ़ से घेरे हुए है।
रामबाग़ महल कुल 85 एकड़ ज़मीन में फैला हुआ है। पूर्व में ये क्षेत्र इस्लामपुर के नाम से जाना जाता था और इस क्षेत्र पर मुर्शिदाबाद( वर्तमान में पश्चिम बंगाल का एक शहर ) के तात्कालीन शासक अलीवर्दी ख़ान का शासन था। कुछ वर्षों के बाद ये क्षेत्र दरभंगा राजघराने के नियंत्रण में आ गया।

सन 1930 में जब इस्लामपुर का पूरा हिस्सा दरभंगा राजघराने के नियंत्रण में आ गया तो दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह के मन में क़िला बनवाने का विचार आया। सन 1934 में क़िले का निर्माण शुरू हुआ। इस क़िले के निर्माण के लिए एक ब्रिटिश फर्म के ठीकेदार बैग कैग टीम को ज़िम्मेदारी दी गई। उसी वर्ष एक देशव्यापी भीषण भूकम्प आया था, जिससे कारण क़िले का निर्माण कार्य कुछ समय के लिए रोक दिया गया था जो कुछ माह बाद फिर शुरू हुआ।

Darbhanga fort image: (Source :Google)

क़िले की मुख्य दीवारें बड़े- बड़े लाल पत्थरों से बनी हैं और इसके दीवारों की लंबाई एक किलोमीटर और चौड़ाई 500 मीटर अर्थात 1600 फ़ीट है।

क़िले के ऊपरी हिस्से पर गार्ड रूम एवम वाच टावर भी है। इस क़िले के मुख्य द्वार को सिंह द्वार कहा जाता है। राजघराने की सुरक्षा के लिए क़िले की भीतरी दीवार की तरफ़ से बड़ी खाई का भी निर्माण किया गया एवम इसमें हमेशा पानी भरा रहता था। लाल ईंटों से निर्मित होने एवम लाल रंग से रंगे जाने के कारण ये क़िला ‘ दरभंगा का लालक़िला ‘ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

इस क़िले के बारे में जो एक बात और है जिसे कम लोग ही जानते हैं कि दरभंगा का ये लालक़िला दिल्ली के लालक़िले से भी ऊंचा है। लालक़िले की ऊंचाई यमुना नदी की तरफ़ से 60 फ़ीट ही है, जबकि दरभंगा के क़िले की ऊंचाई 90 फ़ीट है। क़िले के चारों तरफ़ सड़क का भी निर्माण किया गया ताकि आवागमन एवम सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। इस लाल क़िले के अंदर कुल 11 मंदिर भी हैं जिनमें राजघराने के लोग पूजा किया करते थे।

   इस क़िले का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये रहा कि ये क़िला तीन तरफ़ दीवारों से तो सुरक्षित बना दिया गया किन्तु पश्चिमी दीवार बनने तक देश आज़ाद हो गया। 

आज़ादी के बाद स्थानीय लोगों ने न्यायालय में जाकर पश्चिमी दीवार के निर्माण पर आपत्ति की कि इस दीवार के बनने से उनके घरों तक धूप नहीं आ पायेगा। न्यायालय ने इस आपत्ति को सही मानते हुए दीवार के निर्माण पर रोक लगा दी जिसके कारण पश्चिमी दीवार का कार्य कभी पूर्ण नहीं हो सका। इस क़िले के ठीक बगल में ही ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय भी अवस्थित है। 1988 में आये भयानक भूकम्प से क़िले की दीवारों को बहुत नुकसान पहुंचा है और राज्य सरकार की उदासीनता के कारण ये क़िला अपनी आख़िरी सांसे ले रहा है।

इसे भी पढ़ें:- नहीं रहीं दरभंगा राजघराने की आखरी बहू कुमारी राजकिशोरी, पूरे मिथिला में शोक की लहर