लॉकडाउन में छिन गई जब परिवार की रोटी, तो सड़कों पर रिक्शा लेकर निकल पड़ी नंदिनी

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Patna: लॉकडाउन (Lockdown) में जिंदगी कितनी मुश्किल हो गई है, यह एक तस्वीर काफी है इसे बयां करने के लिए. सासाराम (Sasaram) की 14 वर्षीय नंदिनी इन दिनों रिक्शा चला रही हैं. लॉकडाउन में जब सब कुछ बंद हो चुका है, ऐसे में अपने परिवार के दो वक्त की रोटी के लिए बेटी रिक्शा लेकर सड़क पर निकल चुकी है.

बता दें कि नंदिनी बौलिया की रहने वाली हैं, जो दूसरे के घरों में चूल्हा-चौका और बर्तन मांजने का काम करती थीं. इनके पिता रिक्शा चलाते हैं, लेकिन लॉकडाउन में पुलिस (Police) द्वारा मारपीट किए जाने के भय से नंदिनी के पापा कहीं और मजदूरी करने चले गए. ऐसे में बेटी रिक्शा लेकर सड़क पर निकल आई, ताकि कुछ पैसे का जुगाड़ हो जाए. अब ये रोज का काम हो गया है.

अब तो लड़की जान कर पुलिस परेशान नहीं करती. नंदनी को रिक्शा चलाता देख गरीबों की बेबसी और लाचारी साफ दिखती है. रिक्शे के पैडल तक भी उसके पांव ठीक से नहीं पहुंचते. लेकिन गरीबी की मार है कि उसे रिक्शा खींचने पर मजबूर होना पड़ा. नंदनी कहती हैं कि कोरोना के कारण चूल्हा-चौका का काम भी बंद है. ऐसे में अब रिक्शा ही सहारा बचा है.

नंदनी कहती हैं कि उनके पापा रिक्शा चलाते थे. लेकिन लॉकडाउन में रिक्शा लेकर निकलने पर कई बार पापा की पिटाई कर दी गई. जिसकी वजह से उन्होंने रिक्शा चलाना बंद कर दिया और मजदूरी खोजने निकल पड़े. ऐसे में दरवाजे पर रिक्शा खड़ा मिला तो वह यह जानकर रिक्शा लेकर निकल गई कि वह लड़की है तो उसे कोई परेशान नहीं करेगा.

वहीं सासाराम के सदर अस्पताल जाने वाले रोड पर नंदनी को दो-चार यात्री भी मिल गए. जिससे वह कुछ रुपए भी इकट्ठा कर पाई. वह कहती है कि लॉकडाउन के कारण घरों में झाड़ू-पोछा का काम बंद है. कोरोना के कारण लोग अपने घरों में उन्हें नहीं बुला रहे हैं. नंदनी कहती हैं कि खेल-खेल में वह रिक्शा चलाना सीख गई थी. उसे क्या पता था कि उसका इतना फायदा होगा?

आज वह अपने परिवार के लिए दो-चार रुपए इकट्ठा कर लेती है, जिससे घर का खर्चा भी निकल जाता है. नंदनी कहती है कि पहले आसपास के लोग कुछ मदद कर देते थे जिससे परिवार चल रहा था लेकिन दूसरों के भरोसे कब तक जिंदगी जिया जाए, इसलिए पापा के बोझ को हल्का करने के लिए वह खुद रिक्शा लेकर निकल जाती हैं. जो भी कमाई होती है वह अतिरिक्त हो जाती है.

नंदनी वैसे लोगों के लिए मिसाल हैं, जो बेरोजगारी का रोना रोते हैं. छोटे-छोटे काम करने में उन्हें शर्म आती है. लेकिन जिस तरह से एक लड़की होकर मजबूरी के दिनों में अपने पिता के काम को अपना कर सड़कों पर उतर आई हैं, उसकी हिम्मत को सभी सलाम करते हैं. नंदनी कहती है कि पहले तो मोहल्ले के लोग उन्हें रिक्शा चलाता देख मजाक उड़ाया करते थे. लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं रहा, सब कुछ सामान्य हो गया है.